खेजड़ी – राजस्थान का राज्य वृक्ष

खेजड़ी

राजस्थान के मरुस्थल क्षेत्रों में उगने वाली वनस्पतियों में खेजड़ी का वृक्ष एक अति महत्वपूर्ण वृक्ष है।यह मरूप्रदेश के कल्पवृक्ष के नाम से जानी जाती है। यह थार निवासियों की जीवन रेखा कहलाती है। यह दलहन परिवार का फलीदार वृक्ष है जिसका वनस्पतिक नाम“प्रोसोपिससिनेरेरिया” है। राजस्थान में खेजड़ी को जांटी के नाम से जाना जाता है ।

राजस्थान के थार रेगिस्तान में खेजड़ी का वृक्ष बहुतायत में पाये जाते है। यहां के मरूस्थलीय जीवन में, खेजड़ी एक जीवन रेखा का कार्य करती है। खेत में खेजड़ी वृक्ष का होना भूमि की उपजाऊ शक्ति का द्योतक है। इस वृक्ष का प्रत्येक भाग किसी न किसी रूप में मरूस्थलीय प्राणियों के लिए उपयोगी व जीवनदायी है, इसलिए ही खेजड़ी के वृक्ष को मरू प्रदेश का कल्पवृक्ष कहा जाता है।

वेदों एवं उपनिषदों में खेजड़ी को #शमी वृक्ष के नाम से वर्णित किया गया है।दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की परंपरा भी है। रावण दहन के बाद घर लौटते समय शमी के पत्ते लूट कर लाने की प्रथा है जो स्वर्ण का प्रतीक मानी जाती है। इसके अनेक औषधीय गुण भी है। पांडवों द्वारा अज्ञातवास के अंतिम वर्ष में गांडीव धनुष इसी पेड़ में छुपाए जाने के उल्लेख मिलते हैं। इसी प्रकार लंका विजय से पूर्व भगवान राम द्वारा शमी के वृक्ष की पूजा का उल्लेख मिलता है।

  • इस वृक्ष का व्यापारिक नाम ‘कांडी‘ है। यह विभिन्न देशों में पाया जाता है, जहाँ इसके अलग-अलग नाम हैं।
    अंग्रेज़ी में यह ‘प्रोसोपिस सिनेरेरिया‘ नाम से जाना जाता है।
  • इसके अन्य नामों में ‘घफ़’ (संयुक्त अरब अमीरात), ‘खेजड़ी’, ‘जांट/जांटी’, ‘सांगरी’ (राजस्थान), ‘जंड’ (पंजाब), ‘कांडी’ (सिंध), ‘वण्णि’ (तमिल), ‘शमी’, ‘सुमरी’ (गुजराती) आते हैं।
  • राजस्थानी भाषा में कन्हैयालाल सेठिया की कविता ‘मींझर’ बहुत प्रसिद्ध है। यह थार रेगिस्तान में पाए जाने वाले वृक्ष खेजड़ी के सम्बन्ध में है। इस कविता में खेजड़ी की उपयोगिता और महत्व का सुन्दर चित्रण किया गया है।

खेजडी वृक्ष का महत्त्व:

शमी या खेजड़ी के वृक्ष की लकड़ी यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है।खेजड़ी का वृक्ष जेठ के महीने में भी हरा रहता है। ऐसी गर्मी में जब रेगिस्तान में जानवरों के लिए धूप से बचने का कोई सहारा नहीं होता तब यह पेड़ छाया देता है। छाल को खांसी, अस्थमा, बलगम, सर्दी व पेट के कीड़े मारने के काम में लाते हैं। इसकी पत्तियां राजस्थान में पशुओं का सर्वश्रेष्ठ चारा हैं। इसमें पेटूलट्रिन एवं खुशबुदार गलाकोसाइड (एम. पी. 252-53)पाया जाता हैं। इसकी फलियां सीने में दर्द व पेट की गर्मी शांत करने मे उपयोगी रहती हैं।

इसके फूलों को चीनी में मिलाकर लेने से गर्भपात नहीं होता हैं। इसकी उम्र सैंकड़ो वर्ष आंकी गयी हैं। इसकी जड़ों के फैलाव से भूमि का क्षरण नहीं होता हैं उल्टे जड़ों में रेत जमी रहती हैं जिससे रेगिस्तान के फैलाव पर अंकुश लगा रहता हैं। जब खाने को कुछ नहीं होता है तब यह चारा देता है, जो लूंग कहलाता है।

इसका फूल मींझर कहलाता है। इसका फल सांगरी कहलाता है, जिसकी सब्जी बनाई जाती है। यह फल सूखने पर खोखा कहलाता है जो सूखा मेवा है। इसकी लकडी मजबूत होती है जो किसान के लिए जलाने और फर्नीचर बनाने के काम आती है। इसकी जड़ से हल बनता है। अकाल के समय रेगिस्तान के आदमी और जानवरों का यही एक मात्र सहारा है। सन १८९९ में दुर्भिक्ष अकाल(छप्पनिया काळ) पड़ा था जिसको छपनिया अकाल कहते हैं, उस समय रेगिस्तान के लोग इस पेड़ के तनों के छिलके (छोडे)खाकर जिन्दा रहे थे। इस पेड़ के नीचे अनाज की पैदावार ज्यादा होती है।

खेजड़ी की फलियों को कच्चा तोडा ना जाय तो ये पकने के बाद खाने में बड़ी स्वादिष्ट लगती है| सुखी पकी फलियाँ जिन्हें राजस्थान वासी खोखा कहते है हवा के झोंके से अपने आप धरती पर गिरते रहते है जो बच्चों के साथ ही बकरियों का भी मनपसंद भोजन है|

खेजड़ी के पेड़ पर लगी इन्हीं फलियों रूपी सांगरियों को कच्चा तोड़कर उबालकर सुखा लिया जाता है| सुखी फलियों को सूखे केर व कुमटियों के साथ मिलाकर स्वादिष्ट शाही सब्जी तैयार की जाती है| ताजा कच्ची सांगरी से भी स्वादिष्ट सब्जी बनाई जाती है पर उसकी उपलब्धता सिर्फ सीजन तक ही सीमित है|

पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि खेजडी के पेड़ो का संरक्षण नहीं किया गया तो एक दिन ऐसा आएगा कि खेजडी का पेड़ इतिहास की धरोहर बनकर रह जाएगा। राज्य सरकार ने वर्ष 1982 में खेजडी को राज्य वृक्ष घोषित किया था, सरकार के राज्य वृक्ष घोषित होने के बाद ना तो वन विभाग की नर्सरियों में इसकी पौध तैयार हुई ना ही इसकें संरक्षण के लिए विभागीय स्तर पर अभियान चले। इसका परिणाम यह रहा कि राज्य की धरती पर बहुतायात में पाए जाने वाले पेड़ निरन्तर कम होते जा रहे है।वर्तमान में काजरी द्वारा इसकी पौध तैयार की गई है जिसमें बिना कांटों वाली पौध विशेष उपयोगी हैं।(आप चाहे तो ये पौध आपको काजरी जोधपुर में मिल जाएगी)

सन् 1730 की भाद्रपद सुदी दशमी के दिन खेजड़ली ग्राम में खेजड़ी वृक्ष को बचाने के लिए विश्नोई समुदाय के तीन सौ तिरेसठ लोगों द्वारा किया गया बलिदान मनुष्य के प्रकृति प्रेम की अनोखी मिसाल हैं। खेजड़ी के लिए किए गए इस बलिदान का ही प्रभाव है कि आज रेगिस्तान में अनेक ऐसे गांव है जहां लोग हरे पेड़ों को नही काटते हैं। धर्मगुरु जसनाथ जी एवं जाम्भोजी ने हरे पेड़ नही काटने व जीव जन्तुओं के शिकार नहीं करने की बात कही।चूंकि जसनाथ जी,जाम्भोजी मरूस्थली इलाकों में पैदा हुए थे इस कारण वे अच्छी तरह जानते थे कि खेजड़ी वृक्ष ही हर स्थिति में मनुष्य के लिये उपयोगी रहता हैं।

किसानों के अनुसार खेतों में खेजड़ी के पेड़ तेजी से नष्ट होते जा रहें हैं। गत 30-35 वर्षों में खेजड़ी के पेड़ों की संख्या घटकर आधी रह गयी है। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले खेतों में इतने अधिक खेजड़ी के पेड़ होते थे कि सीधे हल चलाना मुश्किल होता था और आज गिने-चुने पेड़ बचे हैं। ‘‘खेजड़ी ‘‘बचाना इसलिए भी जरूरी है कि यदि वृक्ष बचेंगे तो जीवन बचेगा अन्यथा हमारी यह हरी-भरी पृथ्वी ही नष्ट हो जायेगी।

पश्चिमी राजस्थान की धोरा धरती के निवासियों से मैं आग्रह करता हूँ कि आने वाली बरसाती में अपने खेत में 5-5 पौधे खेजड़ी के अवश्य लगाएं। मैंने पिछले 2 वर्ष में बारिश के मौसम में मेरे खेत में 10 खेजड़ी के पौधे लगाए जिनका पालन पोषण मेरी आदरणीय माँ द्वारा किया गया। ये आज वृक्ष के रूप में विकसित हो चुके है। आइए साथियो हम राजस्थानी कल्पवृक्ष खेजड़ी को संरक्षित करने में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें। प्रकृति एवं पर्यावरण से अपना नाता जोड़ें।

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